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विचारधारा देश और समाज -१

"विचारधारा देश और समाज" हमारे देश में दुनिया की लगभग सभी तरह की विचारधाराओं का चलन है । प्रत्येक विचारधारा की एक जड़ होती है जो एक बीज से निकलती है जिसमें उसका तना,शाखा, टहनी,पत्तेफूल तथा अंततः परिणाम के रूप में उसका फल निकलता है ज्ञात हो कि बीज के आंतरिक गुण यदि कड़वाहट के हैं या विषैला होगा तो उसे उपयोग करने वाले पर वह बीज अपने गुणों के अनुरूप प्रभाव डालेगा उस बीज का स्वभाव बीज से बने तना,शाखा,टहनी, पत्ते,फूल,फल पर रहता ही है । विचारधारा विभिन्न आयामों में काम करती है मानव समाज में यह उसके संस्कार,धर्म,संस्कृति,साहित्य,आर्थिक, सामाजिक,राजनीतिक,शैक्षणिक विषयों में छाया की तरह दिखाई देती है, जिसका मूल्यांकन आम समाज के समझ के परे की बात होती है । किसी विचारधारा को समझने के लिए उसके बीज से लेकर पेड़ के सभी अंगों की जानकारी और समझ होना चाहिए आइए हम अपने देश में प्रवाहित कुछ विचार धाराओं पर चर्चा करने का प्रयास करें । मोटे तौर पर विचारधाराओं की जड़ों का पता लगा पाना आसान नहीं होता है कि ये ना जाने कितनी मोटी कितनी गहराई तक हैं सामान्य और औसत बुद्धि को केवल बाहर का आकार प्रकार ही दिखाई देता हैं , जिसका मूल्यांकन वह उसी समझ के आधार पर करते हुए उसके प्रति अपनी सकारात्मक या नकारात्मक सोच बनाता है,जब कभी उसे अपनी बनाई धारणा के विरुद्ध पाता है तब वह अपनी धारणा बदलने का प्रयास करता है या कभी-कभी तना या शाखा के क्रियाकलापों से प्रभावित होकर अपनी धारणा में आंशिक बदलाव करते हुए अपने बनाए सोच में स्थिर कर लेता है । -.... आगे

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0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...

"मरकाम गोत्र के टोटम सम्बन्धी किवदन्ती"

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