"प्रजातंत्र प्रणाली में राजनीति ताकत के महत्व को समझे आदिवासी समुदाय।"
संविधान में राष्ट्रपति और राज्यपाल शक्तिहीन राज्य और राष्ट्र के प्रमुख हैं तब आदिवासी समुदाय इनके संरक्षण में कैसे अधिकार सम्पन्न हो सकता है। इसलिये हमें इनके भरोशे किसी भी जनविरोधी आदिवासी विरोधी कानून में दखल देकर उन्के हितों के संरक्षण की आशा कैसे की जा सकती है। इसलिये आदिवासी समुदाय को चाहिये कि वह लोकतंत्र प्रणाली में वोट की राजनीतिक ताकत पैदा करके अपने हितों का संरक्षण कर सकती है। आदिवासी समुदाय अपने राज्य और राष्ट्र के कथित हित संरक्षक से पांचवीं अनुसूचि पेसा कानून या वनाधिकार कानून जैसे मुददों पर उम्मीद करना बेमानी होगी। इसलिये कहा जाता है कि राजनीतिक एक एैसी मास्टर चाबी है जिससे हर समस्या रूपी बंद ताले को खोला जा सकता है।
(गुलजार सिंह मरकाम रा0सं0गों0स0क्रां0आं0)
0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...
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