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एक नज़र इधर भी

" एक नज़र इधर भी" आपसी स्वार्थ के चलते खंड खंड होता आदिवासी बोट बैंक, बेअसर होते जा रहे है जनजातीय राजनैतिक दल, अंदरूनी तौर से यह संगठन भी अब खंड खंड हो गया है और बड़ी संख्या में इनके नेता अपनी अपनी पुरानी पार्टियों की तरफ पलायन के मूड में है। कांग्रेस और भाजपा की विचारधारा से इतर सिर्फ और सिर्फ आदिवासियों को शोषणमुक्त और उनके हितों का कल्याणमात्र से जन्मे ये राजनैतिक दल के कार्यकर्ता और छोटे नेता तो पथभृष्ट नही हुए परन्तु इनका नेतृत्व करने बाले भाजपा और कांग्रेस पार्टी के इसारो पर भांगड़ा कर रहे है , इससे व्यथित हो भोले भाले आदिवासी घरवापसी का मन बना रहे है उनका मानना है कि यही सब होना है तो आदिवासियों के नाम पर राजनैतिक रोटियां सिर्फ अपने नेता ही क्यों खाएँ या खाने दे ?……………..* राकेश प्रजापति *  मध्यप्रदेश में छोटे राजनीतिक दलों की भूमिकाओ ने अक्सर राजनीतिक परिणामों पर हमेशा से ही असर डाला है । कई बार सरकार में भी इनकी सम्मानजनक उपस्थिति देखने को मिली। भारतीय जनता पार्टी और इंडियन नेशनल कांग्रेस, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी,भारतीय गोंडवाना पार्टी, जयस जैसे कई दल है जो आगा...

कोया पुनेम और धर्माचार्य

"बस्तर से नारवेन केशव टेकाम को समर्पित" दादी आपने सही लिखा है,परंतु एक समय था जब समुदाय लगातार रेला की तरह बामनी संस्कारों की तरफ बहता था रहा था जिसमें नौकरी पेशा वालों की तादात ज्यादा थी तब उनके इस रेला को रोकने के लिये ऐसे लोगों को समझाया गया कि गोंडवाना मिशन तुम्हैं ऐसा ही विकल्प दे सकती है,तब कुछ लोग की सहमति के साथ रंगेल सिंह,मंगेल सिंह की मूल किताब पुनेम सार को लेकर डा०पी एस मरावी जबलपुर एवं उनके साथियों ने गोंडी मंत्रों का संकलन करके एक पुस्तक का प्रकाशन कराया जिसमें मंत्र सहित पूजा विधान उल्लेखित है । अर्थाभाव से इसकी ज्यादा प्रतियां नहीं छपीं परंतु डा०पीएस मरावी एवं उनके साथ के लोग नौकरी पेशा में थे चंदा करके कुछ प्रतियां लेकर जबलपुर संभाग के कुछ जिलों में जाते और उसी विधान से पूजा कराते रहे समुदाय को इनका यह कार्य पसंद आने लगा।अब नौकरी पेशा वाले भी इस विकल्प की ओर आकर्षित होने लगे,उस समय के पूर्व से हमने पहला गोंडवाना तिथि पत्रक केलेंडर भोपाल से निकालना आरंभ कर दिया था,इसके पूर्व गोंडवाना किरण संचालित हुआ जो तेकाम बंधुओं की व्यक्तिगत संपत्ति थी। सन २००० के बाद छग ...

खरी खरी

"खरी खरी" गोंडवाना का सामाजिक,धार्मिक सांस्कृतिक आंदोलन लगातार निर्बाध बढ़ रहा  है, परंतु इसका राजनैतिक पक्ष दलाली और बिकाऊपन का शिकार होकर अस्ताचल की ओर जा रहा है। समुदाय का सामाजिक,धार्मिक सांस्कृतिक आंदोलन में विश्वास बढ़ा है लेकिन राजनीतिक आंदोलन पर से लगातार निराशा के कारण वोटबैंक कमजोर हुआ है,अब इसे रोकना कठिन हो गया है। गोंडवाना का राजनीतिक आंदोलन केवल तनाव या टेंशन मूव्हमेंट रह गया है जो थोड़ा बहुत दबाव बना सकता है पर परिणाम नहीं दे सकता। भाजपा अपने लाभ के लिये इसे कुछ दिन और जीवित रखने का प्रयास कर सकता है पर कांग्रेस इसे किसी भी कीमत पर पूरी तरह समाप्त कर देना चाहता है। इसलिये समुदाय सामाजिक,धार्मिक सांस्कृतिक आंदोलन के आधार को मजबूत करें,भविष्य में किसी भी रूप में गोंडवाना के राजनीतिक आंदोलन की पुनः वापसी संभव है।(गुलजार सिंह मरकाम रासंगोंसक्रांआं)

"बस एक बार ,आखरी बार। एकजुटता की दरकार।"

"बस एक बार ,आखरी बार। एकजुटता की दरकार।" गोंडवाना आंदोलन की राजनीतिक इकाई में कार्यरत चिंतक समर्थक और समर्पित कार्यकर्ताओं से अनुरोध है,कि विभिन्न कारणों से चुनाव 2018 के विधानसभा चुनाव में, कार्यकर्त्ताओं के बीच आपसी मतभेद बढ़े हैं। इसमें कहीं ना कहीं सामंजस्य और पारदर्शिता की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण रहा है । फिर भी आपके कार्यकर्ता और मतदाताओं ने आपका मन धन से सहयोग कर वोट प्रतिशत को दुगना कर आपके मनोबल को बढ़ाने का काम किया है। अब आपकी बारी है/जिम्मेदारी है कि लोकसभा चुना व 2019 तक समाज और मतदाताओं के मनोबल को कैसे बनाये रखा जाय, ताकि और भी बेहतर परिणाम मिल सके। आपके सामने चुनौती है, कांग्रेस और भाजपा ! कांग्रेस का प्रयास रहेगा कि या तो गोंडवाना के राजनीतिक आंदोलन को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाय परंतु इसमें उसे अधिक मेहनत संगठन में तोड़फोड़ करना पड़ सकता है, इसलिए केंद्र सरकार बनाने के लिए यह आपसे समझौता कर सकती है जिसमें उसे कम ताकत लगाना पड़ेगा। चूंकि चुनाव नजदीक है इसलिए वह कम ताकत लगाकर ज्यादा परिणाम लाने का प्रयास कर सकती है। वहीं भाजपा का प्रश्न है वह ऐसा प्रयास करे...

"Policy of great leader kansiram"

"Policy of great leader kansiram" कांशीराम ने अपने जीते जी किसी सवर्ण को राष्ट्रीय पदाधिकारी नहीं बनाया उनका कहना था कि हमारे गुप्त एजेंडा की जानकारी इन्हें ना हो,जब तक बहुजन समाज अपने पैरों पर खड़ा होकर उनकी अगुवाई के लायक ना बन जाए , परिणाम सामने था एक दलित महिला मायावती को मुख्यमंत्री पद मिला।जब तक बहुजन समाज पार्टी तथा मायावती कांशीराम के निर्देश पर चली तीन बार मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला।परंतु जब से मायावती ने सवर्णों को उच्च पदों पर बैठाना शुरू कर दिया। सरकार बनाना,दूभर हो गया। क्या गोंडवाना को इससे सबक लेकर केवल गोंडवाना का मूलनिवासी,अजा/जजा/पिछड़ा वर्ग/अल्पसंख्यक को महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर गोंडवाना के राजनीतिक आंदोलन को आगे बढ़ाया नहीं जा सकता ? हमें गोंडवाना के मूलनिवासियों को प्राथमिकता देना चाहिए इन्हें महत्त्व देना चाहिए,ना कि सवर्णों को।  -गुलजार सिंह मरकाम (राष्ट्रीय संयोजक अगोंसक्रांआं )

"राजनीतिक दल और उनके प्रकोष्ठ"

"राजनीतिक दल और उनके प्रकोष्ठ" कभी किसी ने विचार किया कि देश में जितनी भी राजनीतिक पार्टी है उनमें अनुसूचित जाति जनजाति अन्न पिछड़ा और अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ सहित अनेक प्रकोष्ठ बनाए जाते हैं परंतु कोई भी दल "सामान्य वर्ग प्रकोष्ठ" नहीं बनाती आखिर क्यों? क्या इन दलों के मुखिया बिना सामान्य वर्ग को साथ लिये अपने आपको असहाय या कमजोर महसूस करते हैं।या फिर भयभीत रहते हैं। यही कारण है कि देश में जितने भी मूलनिवासी नेतृत्व वाले दल हैं। राष्ट्रीय क्षितिज पर उभर नहीं सके हैं। केवल वही दल  उभरे हैं जिन दलों का नेतृत्व सवर्ण करते हैं। यदि मूलनिवासी नेतृत्व वाले दल इन्हें अपने साथ लेना आवश्यक समझते हैं,तो उनके लिए "सामान्य वर्ग प्रकोष्ठ" बनाकर उनकी क्षमता का मूल्यांकन करें। यह नहीं कि मूलनिवासी समुदाय की जनसंख्या पर अपनी छवि बनाकर अपना कद बढ़ाकर अपने आप को श्रेष्ठ होने का परिचय दें। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि देश के सभी मूलनिवासियों के नेतृत्व में चलने वाले दल अपनी पार्टी में ऐसे प्रकोष्ठ तैयार कर उनकी राजनीतिक क्षमता का मूल्यांकन करें।तब समझ में आयेगा कि अन्य योग्यताओं...

"राजनीतिक दलों में चुनाव प्रक्रिया का संवेदनशील चरण डेमेज कंट्रोल"

"राजनीतिक दलों में चुनाव प्रक्रिया का संवेदनशील चरण डेमेज कंट्रोल" मप्र विधान सभा चुनाव 2018 में गोंगपा भी अपने समर्थक समर्पित कार्यकर्ताओं और गोंडवाना आंदोलन के वफादारों को लेकर चुनाव मैदान में है । चुनावी प्रक्रिया के आरंभिक चरण का समापन हुआ । प्रत्याशी चयन पर वादविवाद से लेकर अधिकृत उम्मीदवार के पक्ष में नाराज आवेदकों जिन्हें अधिकृत नहीं किया जा सका है की नाम वापसी तक की प्रक्रिया भी काफी कठिन है परन्तु इस चरण को भी हम सफलता पूर्वक सम्पन्न कर लेते हैं तो गोंडवाना आंदोलन को राजनीतिक सफलता अवश्य मिलने वाली है । आप सभी ने देखा है कि राजनीति के इस महासमर में हर छोटे बडे राजनैतिक दल में टिकिट को लेकर नाराजगी दिखी है कोई पाला बदला तो कोई मारपीट किया परन्तु पार्टियां अपने संगठन और समर्थकों के भरोशे चुनाव मैदान में डटी हुई हैं । संगठन में एक एक व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है। प्रत्येक संगठन में गुटबंदी स्पष्ट दिखाई देती है इसका मतलब यह नहीं कि कोई भी पदाधिकारी संगठन का नुकसान चाहता है। चुनाव का यह चरण सभी दलों के लिये कठिन होता है । परन्तु समय के साथ सबकुछ ठीक हो जाता है संतुष्ट असं...