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[संसद ने एैतिहासिक भूल को स्वीकारते हुए वनाधिकार कानून बना दिया ।]

  '' 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर छोटी सी भेंट''   [संसद ने एैतिहासिक भूल को स्वीकारते हुए वनाधिकार कानून बना दिया ।] *यदि हम इस अधिकार को हासिल नहीं कर सके तो हमसे एैतिहासिक भूल होगी ।* जल जंगल जमीन के संघर्श से जुडे या कानून के जानकार तथा बुद्धिजीवियों को जानकारी है कि अनु0जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासियों के लिये वनधिकार कानून बन गया है । इसके संक्षिप्त इतिहास की ओर जाये ंतो जल जंगल जमीन के संघर्श से जुडे संगठनों लोगों के लगातार दबाव से केंद्र सरकार ने संयुक्त संसदीय दल का गठन कर उसे देष भर की वन भूमि पर काबिज लोगों का सर्वे कराया गया । परिणाम स्वरूप इस कमेटी ने संसद को वनभूमि के काबिजो की स्थिती के बारे में रिपोर्ट दी जिसमें कहा गया कि आजादी के तुरंत बाद मालगुजारों और जमीदारों की भूमि किसानों को वापस की गई थी इसी तरह आजादी के पूर्व से काबिज इन लोगों को जो वन ग्राम में निवास करते हुए वनों के आसपास खाली भूमि पर कास्त कर रहे हैं इनके नाम कर देना चाहिये था लेकिन तत्कालीन सरकारों ने इन्हें कास्त तो करने दिया लेकिन इन्हें उसका मालिक नहीं बनाया । धीरे धी...

म0प्र0 की ग्राम पंचायतों को अपने ग्राम हित के लिये एक महत्वपूर्ण अवसर

 म0प्र0 की ग्राम पंचायतों को अपने ग्राम हित के लिये एक महत्वपूर्ण अवसर           15 या 16 अगस्त को एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित करें । म्0प्र0 में 15 अगस्त तथा 26 जनवरी का एक एैसा अवसर आता है जब सरकार ग्राम पंचायतों को ग्राम सभा आयोजित करने का अवसर देती हैं । जिसमें ग्राम की समस्या या जनहित के कार्यों के लिये प्रस्ताव पारित किये जाते हैं । इसके अतिरिक्त प्रदेष में ग्राम सभा के आयोजन अधिकतर नहीं आयोंजित होते । ना ही सरकार की ओर से आयोजित कराये जाने की इच्छा होती । चूंकि एैसे अवसर या तो सरकार के निर्देष से या केवल महत्वपूर्ण तिथियों में कराये जाने की परंपरा बन चुकी है । भले ही ग्राम वासियों को वर्श भर कितनी ही समस्याओं से जूझना पडे लेकिन उन्हें सरकारी निर्देषों की राह देखना पडता है जो सीधे सीधे प्रजातंत्र में ग्रामसभाओं के महत्व को कम करने जैसा है ।        अतः प्रदेष के समस्त ग्राम पंचायतें 15 या 16 अगस्त जब भी ग्राम सभा का आयोंजन होता है प्रत्येक पंचायत ग्राम सभा में यह प्रस्ताव आष्यक रूप से रखे तथा इसे ग्राम सभा में पारित करा ले कि ....

''पुरखों का मार्गदर्षन ही हमारा आधार हो ।''

                                           ''पुरखों का मार्गदर्षन ही हमारा आधार हो ।''                                     व्यवहार के बिना तत्वज्ञान बांझ औरत के समान है । किसी समाज के उत्थान के लिये समाज के आधार तत्व भाशा धर्म संस्कृति का महत्वपूर्ण योगदान होता है । जो उस समाज का आत्मविष्वास आत्मबल बढाता है । हमारे महापुरूशों को ज्ञात था कि समाज के आधार तत्वों का सामाजीकरण कर देने से इसे कभी भी नहीं मिटाया जा सकता । जो आज हमें अपने महापुरूशों की बात कटुसत्य प्रमाणित हो रही है। हमारे महापुरूशों को पूर्वाभाश था कि आने वाली सन्तानों को क्या कुछ नहीं झेलना पडेगा । सिंधुघाटी में षंबर के सैकडों किले ध्वस्त कर दिये गये । सिंधु नदी पर बने विषाल बांध जिसके प्रमुख बाणासुर थे को मारकर बांध फोडकर दिया जिसके कारण सिंधुधाटी के नीचे विषाल नगर मलवे में दब गये । हमारी कृति को नश्ट कर दिया गया । मध्यकाल म...

देश को अब आदिवासी समाज के प्रकृतिवादी दर्शन की आवश्यकता है !

        देश   को   अब   आदिवासी   समाज   के    प्रकृतिवादी   दर्शन    की   आवश्यकता   है  ! हमारा   देश   उद्योग   धंधे   शिक्षा   चिकित्सा   के   क्षेत्र   विज्ञानं   एवम   प्रोद्योगिकी   के   क्षेत्र   में   लगातार   आगे   बढ़   रहा   है  !  इस   तरह   आगे   बढ़ना   देश   की   उन्नति   का   बाह्य   स्वरुप   है   जो   लुभावना   लगता   है  !  इस   पर   सभी   को   गर्व   होता   है  !  वहीँ   देश   के   आंतरिक   स्वरुप   पर   नजर   डालते   हैं    तो   लगता   है   हम   लगातार   गिरते   जा   रहे   हैं  !  बाहरी   द्रश्य   जितना   सुन्दर   है    आंतरिक ...