"दो वोट के अधिकार का सामाजिक रूप से उपयोग संभव है"
पूना पैक्ट मैं गांधी के द्वारा की गई धूर्तता पूर्ण छल कपकपट दो वोट के अधिकार से वंचित किया जाना,को संसद,विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव घोषणा के साथ दो वोट के प्रयोग का रिहर्सल करके गांधी की कपटता का जवाब दिया जा सकता है। यथा चुनाव घोषणा के साथ ही निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित मतदान तिथि और नामांकन के पूर्व अनुसूचित वर्गो द्वारा आसन्न चुनाव में भाग लेने वाले इच्छुक प्रतिभागियों के बीच प्रथम "एक वोट" का सामाजिक मतदान की व्यवस्था करके सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी को ही मुख्य चुनाव में प्रत्याशी बनाया जाये तथा उसे ही समुदाय द्वारा "दूसरा वोट" से मतदान करने की अपील हो । ऐसा करने से किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में आपका प्रत्याशी ही विजयी हो सकता है। अनुसूचित वर्गों द्वारा इस तरह का किया गया प्रयास गांधी को पूना पेक्ट का उचित जवाब होगा।
--गुलजार सिंह मरकाम (gska)
0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...
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