चुनाव के लिए राजनीतिक दलों को इशू चाहिए उसके लिए इशू प्रायोजित किये जाते हैं। इसमें जन समस्या , जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी जैसे मुद्दों से जनमानस को प्रभावित नहीं करने की समस्या पक्ष या विपक्ष किसी को आती दिखाई देती है तब समाज की भाषा धर्म संस्कृति उसका मूल स्त्रोत है,उस पर राजनीति आक्रमण की कोशिश होती है, जिसमें व्यक्ति जाति धर्म संप्रदाय के नाम पर इशू तैयार किया जाता है, इसमें चाहे कितनी ही हत्या, बलात्कार आगजनी करना पडे , राजनीतिक दलों को कोई फर्क नहीं पड़ता, इसका शिकार तो व्यक्ति समुदाय और समाज होता है। अब आसन्न चुनाव है । मप्र भी इस क्रम से अछूता कैसे रह सकता है। इसका एक ही इलाज है, पीड़ित व्यक्ति,जाति समुदाय और समाज में आपसी सौहार्द और समझ विकसित करे। -(gska)
0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...
Comments
Post a Comment