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नैसर्गिक न्याय और न्यायपालिका

 यदि इस देश में मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च के नाम पर धर्मो के पुरातन जड़ों को खोदकर अपनी बपौती के लिए कोर्ट के फैसले को महत्व देते हैं,तब हमारे देश का मूलवंश आदिवासी तो कोर्ट बनने संविधान बनने के पूर्व का वासिंदा है वर्तमान समय में देश में चल रही अराजकता को देखते हुए आदिवासियों की "परंपरागत न्याय" व्यवस्था सर्वोपरि है ,जो सभी "परदेशी धर्म" एवं कथित थर्मावलंबियों को मानना होगा, क्योंकि इस देश की भूमि पर सभी पुरानी धरोहर मूल वंश आदिवासियों का है, इसलिए कोई भी कानून उनसे ऊपर नहीं हो सकता।

(गुलजार सिंह मरकाम)

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