हमारी सोच लगातार आदिवासी हित के लिए बढती जा रही है !अच्छा संकेत है ! इस सोच को लगातार बनाये रखकर विभिन्न छेत्रो में जो वैचारिक अंतर दिखाई देता है ! यथा( धार्मिक सामाजिक एवं राजनितिक )उन वैचारिक अंतर को भी धीरे धीरे कम करना है !हमारी सांस्कृतिक पहचान तो लगभग एक है इसमें दो राय नहीं यही विषय हमारी एकता का सूत्र भी है ! धार्मिक विषय थोडा सवेदनशील है पर बुद्धिजीवी इसे अच्छी प्रस्तुति देकर समाज को एक दिशा में ला सकते है ! अभी हम समस्या के आधार पर एकजुट होते नजर आ रहे है पर ये काफी नहीं होगा ! हमें उन तमाम विषयों पर एक सोच एक विचार रखना रखना होगा तब हम किसी समस्या पर एक व्यवहार [एक्शन ] कर पाएंगे ! यही कॉमन एक्शन हमारी ताकत होगी ! यही हमारे विजय की सीदी होगी !
0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...
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