"सफलता का सूत्र"
3.5 प्रतिशत बामन 100 प्रतिशत जागरूक है, इसलिए सक्रियता के कारण वह चारों ओर ज्यादा संख्या में दिखाई देता है, वहीं आदिवासी उससे संख्या बल में अधिक है पर जागरूकता के अभाव में सक्रिय ना होने के कारण नगण्य दिखाई देता है। यह नगण्यता उसके आत्मविश्वास और मनोबल को कमजोर करता है। इसलिए आदिवासी समुदाय कोई भी जोखिम उठाने से हिचकता है। जो व्यक्ति या समुदाय जोखिम (risk) नहीं उठाता वह किसी भी क्षेत्र (field ) में सफल नहीं हो सकता।
"जोखिम उठाओ सफलता पाओ" ।
-गुलज़ार सिंह मरकाम
(राष्ट्रीय संयोजक गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन)
0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...
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