अनुसूचित जनजाति घोषित लोकसभा विधानसभा या निकाय क्षेत्रों में गैर आदिवासी वोट बैंक को हासिल करने के लिए आरक्षित वर्ग का जनप्रतिनिधि अपनी धर्म संस्कृति प्रीति और परंपराओं को भी ताक में रख सकता है। क्योंकि गैर जनजाति मतदाता इन आरक्षित क्षेत्रों के मतदान में वेलेंसिंग की भूमिका में रहता है। ऐसा मतदाता सतर्क और जागरूक भी रहता है इसलिए आरक्षित वर्ग के प्रत्याशी जीतने के बाद इनका ज्यादा ख्याल रखते हैं और इनकी भाषा धर्म संस्कृति को सिर आंखों पर बैठा कर रखते हैं। यदि यह लोग अपने समुदाय की भाषा धर्म संस्कृति परंपराओं पर कट्टर होते तो यह कट्टरता गैर आदिवासी मतदाता को अपने साथ चलने के लिए मजबूर कर देते। भविष्य की इसी आशंका को देखते हुए डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी ने गोलमेज कांफ्रेंस में पृथक निर्वाचन अथवा दो वोट के अधिकार को दिलाने का प्रयास किया था। यदि वह अधिकार मिल गया होता तो आरक्षित क्षेत्र के जनप्रतिनिधि गैर आदिवासी वोट बैंक से भयभीत नहीं होते।
(Gska)
0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...
Comments
Post a Comment