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संघर्ष और मनोरंजन

"संघर्ष और मनोरंजन(नाच गान संस्कृति) अधिकार प्राप्ति में आंदोलन को कमजोर बनाता है।" "संघर्ष और मनोरंजन (नाच गाने संस्कृति) एक साथ चलने से कोई भी आंदोलन धारदार नहीं बन सकता चूंकि एक ओर हम आंदोलन के माध्यम से अपने हक और अधिकार के लिए आक्रामक गुस्सा लिये संघर्ष कर रहे होते हैं, वही एकसाथ सांस्कृतिक आयोजन करके उस गुस्से को मनोरंजन का आयोजन करके ठंडा कर लेते हैं। यही कारण है कि हमें अपने समुदाय को बार बार एक ही विषय पर पुनर्जागरण की आवश्यकता पड़ती है। मेरा मानना है कि समुदाय श्रमजीवी है अधिक शारीरिक श्रम करता उसे शारीरिक मानसिक थकावट के लिए समय समय पर मनोरंजन की भी आवश्यकता है। परन्तु उसके लिए हमारे पुरखों ने ऋतु आधारित मनोरंजन की व्यवस्था निर्धारित की है, परन्तु हमारा समुय इससे सीख लेने की बजाय, पुरखों के व्यवस्थित क्रम को तोड़ देता है। आज का दौर प्रतियोगिता का है ऐसी परिस्थितियों में हमें नाच गान जैसी सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं का आयोजन करके मनोरंजन के साथ कला को निखारने की आवश्यकता है।अधिकारों के लिये संघर्ष में केवल संघर्ष दिखाई दे।" -गुलजार सिंह मरकाम ( रा०अ०ग्रागपा)

विश्व आदिवासी दिवस

9 अगस्त विश्व आदिवासी (इंडीजीनियस)दिवस" 9 अगस्त विश्व के आदिवासियों (इंसान के मूलबीज)की जीवन पद्धति उनकी भाषा धर्म संस्कृति साहित्य और परंपराओं को संरक्षित रखते हुए वर्तमान सामान्य विकास की दौड़ में वे पीछे ना रह जाएं इस बावद संयुक्त राष्ट्र संघ ने सभी सदस्य देशों को आव्हान किया है कि सदस्य देशों की सभी सरकारें विभिन्न स्तर पर प्रति वर्ष 9 अगस्त को जन सभा का आयोजन कर अपनी सरकार द्वारा आदिवासियों के उत्थान में वर्ष भर किये गये प्रयास की आदिवासियों के समक्ष समीक्षा एवं रिपोर्ट तैयार कर प्रस्तुति देते हुए कर संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रेषित करने का दिवस है। यह कोई उत्सव नहीं जो किसी को खुश करना है, बल्कि सरकारें आदिवासियों को खुश करने के लिए स्वयं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करें। हमारे समुदाय की जिम्मेदारी यह है कि 9 अगस्त हमारे लिए क्यों महत्वपूर्ण है इसकी जानकारी से सबको अवगत कराते हुए जागरूक करे। - गुलजार सिंह मरकाम

गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन को समझे बिना गोंडवाना आंदोलन समझ में नहीं आएगा

"गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन" को समझे बिना गोंडवाना आंदोलन समझ में नहीं आयेगा। -गुलजार सिंह मरकाम गोंडियन दर्शन के मार्ग पर चलने वाले नवज्ञानी लोगों को मेरा सुझाव है कि जो समुदाय अपने पिछले बीते इतिहास को नहीं जानेगा तब तक नया इतिहास नहीं लिख सकता! लेखन और लेख तो होंगे परन्तु इतिहास नहीं बना सकते। यह भी काफी हद तक सही है कि इतिहास सत्ताओं से प्रभावित भी होता है ,परन्तु विपक्ष को पूरी तरह नहीं नकार पाता। गोंडवाना आंदोलन के कुछ नवज्ञानी जो मात्र अधूरे ज्ञान या अंधभक्ति की पराकाष्ठा में गोंडवाना आंदोलन के इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ियों को दरकिनार करके अपनी आत्ममुग्धता में आंदोलन का नुक़सान कर देते हैं। गोंडवाना आंदोलन के महान पुरोधा जो चाहे देश की आजादी के पूर्व के हों या बाद के भी ऐसे नायक गोंडवाना आंदोलन को किसी ना किसी तरह जिंदा रखे। जिसमें मध्य गोंडवाना के राजा लालश्याम शाह हो हर्रई पगारा के राजा ,धोकल सिंह मरकाम ,कंगला माझी मंगरू उईके हों या उनके बाद आंदोलन को चलाने वाले प्रथम पंक्ति में सुन्हेर सिंह ताराम मोतीरावन कंगाली शीतल मरकाम हीरा सिंह मरकाम, व्यंकटेश आत्राम,के बी म...

विचारधारा देश और समाज-२

हमारे देश में विचारधाराएं अपने विचार को समाहित किए झंडे, रंगो, स्मृति चिन्हों में संगठन के नामों,नारों, स्थापित स्मारकों, साहित्य के शब्दों में दिखाई पड़ते हैं । इसे ही कहा जाता है एक सोच, एक विचार, एक व्यवहार इसी बल से एक विचारधारा अपेक्षित परिणाम की उम्मीद लिए समाज में अपनी विचार को प्रवाहित करती रहती है । समाज का कुछ हिस्सा जाने अनजाने अति प्रचार या भावुकताता में त्वरित या तात्कालिक लाभ को देखकर उस धारा में बहने लगता है । हमारे देश का जनमानस अनेकों बार अनेकों विचारधारा में बहकर छला जा चुका है और लगातार छला जा रहा है, यह जनमानस विचारधाराओं की नई-नई प्रस्तुतियों से देश के मूल बीज और मूल विचारधारा को भुला बैठा है अब देशवासियों को दक्षिणपंथी मनुवादी हिंदुत्व, कट्टर इस्लामी, साम्राज्यवादी इसाईयत,भौतिकवादी नास्तिक साम्यवाद सहित कथित देसी सामाजिक न्याय की समाजवादी विचार धारा,व्यवस्था परिवर्तन के लिए प्रतिशोध की भावना से स्थापित संगठनों के बहाव में बहना बंद कर देना चाहिए । उपरोक्त सभी विचारधाराएं अपना रंग रूप और लक्ष्य के लिए आपको अपनी अपनी विचारधारा मैं बहाकर अपना लक्ष्य हासिल करना चाहती ...

विचारधारा देश और समाज -१

"विचारधारा देश और समाज" हमारे देश में दुनिया की लगभग सभी तरह की विचारधाराओं का चलन है । प्रत्येक विचारधारा की एक जड़ होती है जो एक बीज से निकलती है जिसमें उसका तना,शाखा, टहनी,पत्तेफूल तथा अंततः परिणाम के रूप में उसका फल निकलता है ज्ञात हो कि बीज के आंतरिक गुण यदि कड़वाहट के हैं या विषैला होगा तो उसे उपयोग करने वाले पर वह बीज अपने गुणों के अनुरूप प्रभाव डालेगा उस बीज का स्वभाव बीज से बने तना,शाखा,टहनी, पत्ते,फूल,फल पर रहता ही है । विचारधारा विभिन्न आयामों में काम करती है मानव समाज में यह उसके संस्कार,धर्म,संस्कृति,साहित्य,आर्थिक, सामाजिक,राजनीतिक,शैक्षणिक विषयों में छाया की तरह दिखाई देती है, जिसका मूल्यांकन आम समाज के समझ के परे की बात होती है । किसी विचारधारा को समझने के लिए उसके बीज से लेकर पेड़ के सभी अंगों की जानकारी और समझ होना चाहिए आइए हम अपने देश में प्रवाहित कुछ विचार धाराओं पर चर्चा करने का प्रयास करें । मोटे तौर पर विचारधाराओं की जड़ों का पता लगा पाना आसान नहीं होता है कि ये ना जाने कितनी मोटी कितनी गहराई तक हैं सामान्य और औसत बुद्धि को केवल बाहर का आकार प्रकार ही...

मूलवासी मूल निवासियों का धर्मनिरपेक्ष चश्मा

पहले कॉन्ग्रेस मनुवाद की ए टीम मानी जाती थी जिसने मूलवासी, मूल निवासियों को धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा कर भाजपा रूपी बी टीम को स्थापित करने के लिए मंदिर मस्जिद जैसे ईवीएम जैसे मुद्दों को लाकर भाजपा को ए टीम बनने का अवसर दिया है। देश का मूलवासी मूलनिवासी कांग्रेस को धर्मनिरपेक्षता के चश्मे से देखता रहा जबकि इस देश में जितने भी धर्म है वे अपने अपने धर्मों को मजबूत करते रहे भाषाओं को मजबूत करते रहे अपने सांस्कृतिक पक्ष को मजबूत करते रहे वही देश के आदिवासी की बनी बनाई सांस्कृतिक, धार्मिक विरासत मिट्टी में मिलती गई इसका कौन जिम्मेदार है । इसका मतलब हम धर्मनिरपेक्षता का चश्मा पहने रहें और अन्य लोग अपनी पहचान को मजबूत करते रहें ? आज की तारीख में देश में गांधीवादी अंबेडकरवादी समाजवादी विचारधाराएं चल रही है जिनकी आंतरिक धार्मिक संरचना का लक्ष्य कोई ना कोई धर्म होता है उनके संस्कृति और संस्कार होते हैं, अब हम यह चलने नहीं देंगे । वर्तमान समय में सांस्कृतिक जय पराजय का दौर चल रहा है ऐसे में सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक लामबंदी आवश्यक है। जो सत्ता को प्रभावित करने के लिए आवश्यक है। (Gska)

("GSKA" मध्यस्थता के लिए तैयार है

गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन लंबे समय से अनवरत जारी है आशा है इसी तरह सतत जारी रहे। गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन में जिन सामाजिक धार्मिक आर्थिक सांस्कृतिक भाषाई साहित्यिक जैसी शाखाओं को एक दूसरे से समन्वय कराते हुए आगे बढ़ाया गया परिणाम स्वरूप आज राष्ट्रीय क्षितिज पर यह आंदोलन कहीं ना कहीं अपेक्षित परिणाम दे रहा है परंतु गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन की इन शाखाओं को सुरक्षा और संरक्षण देने के लिए राजनीतिक इकाई को अवसर दिया गया यह इकाई लंबे समय तक कोई अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रही है कारण बहुत से हैं परंतु कहा जाता है ना की राजनीति में धन है ग्लैमर है वाहवाही है इसलिए आंदोलन की आधार शाखाएं भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी परिणाम स्वरूप राजनीतिक इकाई अन्य शाखाओं को प्रभावित करने लगी । कायदा तो यही था की अन्य इकाइयां अपनी शाखाओं से व्यक्तियों को तैयार करके राजनीतिक शाखा में स्थापित करने का काम करती परंतु राजनीति के चलते इन शाखाओं के प्रस्तावित प्रतिनिधियों को कभी भी अवसर नहीं दिया गया अतः सामाजिक संगठन भी धीरे धीरे राजनीतिक आंदोलन से किनारा करके अपने तरीके से आंदोलन को चलाने लग...