"एकता का संदेश बनाम अंधविश्वास"
कोरोना जैसी महामारी में भी आर एस एस, मोदी के माध्यम से विज्ञान के बीच अंधविश्वास को बचाने का प्रयत्न कर रही है। जब लगने लगा कि कोरोना पूजा और पाखंड से नहीं विज्ञान के अविष्कार से रूकेगी,तब अंधविश्वास को सुरक्षा की चादर ओढ़ाकर घंटा घंटी थाली दीपक बजाकर अंधविश्वास का पैमाना बनाया बनाया। थोड़ी सी सफलता ने पुनः मोदी के माध्यम से टार्च मोबाइल या दीपक जलाकर कथित एकजुटता बनाम कोरोना से संघर्ष का बेतुका संदेश दिया जा रहा है। जब वैज्ञानिकों ने डिस्टेंस लाकडाऊन और सुरक्षा उपकरण को सबसे कारगर उपाय बता दिया तब अलग से ऐसा नाटक क्यों ? इससे दुनिया में देश की बेइज्जती हो रही है। इसी बीच एक और बेइज्जती की बात कि धर्म विशेष के लोगों के द्वारा कोरोना फैलाये जाने की खबर फैलाना भी कुछ लोगों के कारण भारत देश की मानसिक रूग्णता को ही दर्शाता है।
(गुलजार सिंह मरकाम राष्ट्रीय संयोजक गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन)
0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...
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