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"व्यापारिक मानशिकता का शिकार हो रही हमारी व्यवस्था ।"

"व्यापार का सीधा अर्थ है लाभ कमाना चाहे लाभ का कोई रास्ता हो । लाभ के अंदर लोभ लालच छुपा रहता है जो ग्राहक को व्यापारी की मासूमियत के सामने दिखाई नहीं देता । लोभ के चलते लाभ कमाने की कोई सीमा नहीं होती । जैसा ग्राहक वैसा दाम । व्यापार के इसी दुर्गुण ने पूंजीवाद को जन्म दिया है मिलावट खोरी जमाखोरी को पैदा किया है नकली उत्पाद को बढावा दिया है । लाभ् के सामने गरीब या गरीबी का कोई मायना नहीं । व्यापार कभी संतुष्ट नहीं होने देगा । व्यापार का सामाजिक सरोकार से कोई नाता नहीं । बल्कि प्राकृतिक आपदा या अकाल जैसी स्थिति में व्यापारी बुद्धि की आंखों में चमक आ जाती है । आज के समय में सत्ताधारी सरकारें भी व्यापारी की भूमिका में आ चुकी हैं । जनहित और विकास के मुददों पर लाभ हानि देखने लगीं है । सामाजिक सरोकारों से जुडे आवश्यक बजट में कटौती केवल इसलिये कि सरकार का खजाना खाली हो जायेगा । शासकीय सेवा में लगातार कर्मचारियों की छंटनी भी इसी का नतीजा है । देश का नागरिक और नागरिक का दिया टेक्स ,देश की धरती का खनिज, देश की संपत्ति इसमें लाभ हानि का सवाल नहीं वरन अधिक से अधिक रोजगार मुहैया कर, समग्र विकास की व्यवस्था कराना प्रथम कर्तव्य है । व्यापारिक बुद्धि के वातावरण ने पूंजीपति बनने की होड पैदा कर दी, जिसके कारण मानवीय संवेदना भी मर चुकी है । अब तो रिस्ते और नातों में भी लाभ हानि देखी जाती है । भरे पूरे परिवार होने के बावजूद वृद्धाश्रम में रहने वाले बूढे मां बाप पर क्या गुजरती होगी ,यह सब व्यापारिक मानसिकता का परिणाम है जिससे मुक्ति का प्रयास करना होगा । यह देश एैसा नहीं था, किसी गीतकार ने लिखा और गायक ने गाया भी है । "हम जिस देश के वासी हैं, ज्यादा की जरूरत नहीं हमको थोडे में गुजारा होता है ।" अर्थात व्यापारिक मानसिकता ने संतुष्टि का गला घोंट दिया है ।"-gsmarkam

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