"संदिग्ध और अविश्वसनीय होता हुआ सुप्रीम कोर्ट"
सुप्रीम कोर्ट के सारे फैसले मूलनिवासियों के विरुद्ध दिये जा रहे हैं, देश के असली मालिक आदिवासी को तो हाशिए में ही रख दिया गया है। अंग्रेजों की लिखी बात सच हो रही है कि "बामन जाति के न्यायधीश से नैसर्गिक न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती, क्यूंकि वह पक्षपाती होता है" आज की तारीख में सुप्रीम कोर्ट में 99 प्रतिशत जज बामन हैं। इसलिए राष्ट्रपति को चाहिए कि वह कालेजियम नियुक्ति सिस्टम को खत्म करे या सुप्रीम कोर्ट को भंग कर नये सिरे से जजों की नियुक्ति करे। अन्यथा सुप्रीम कोर्ट से जनता का विश्वास लगातार उठता जा रहा है। भविष्य में यदि देश में अराजकता पैदा होती है,तो दुनिया में देश की साख गिरेगी।समय रहते इस पर विचार नहीं किया गया तो देश को भीषण संकट से बचाया नहीं जा सकता। भविष्य में आने वाली पीढ़ी हमें माफ नहीं करेगी।
(गुलजार सिंह मरकाम राष्ट्रीय संयोजक गोंडवाना समग्र क्रांति आंदोलन)
0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...
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