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“आदिवासी हिन्दू या आदिवासी ईसाई यदि आदिवासियों की रूढी परंपरा को नजरंदाज कर ५ वी अनुसूची की बात करता है तो असली आदिवासी को धोखा दे रहा है।“

“आदिवासी हिन्दू या आदिवासी ईसाई यदि आदिवासियों की रूढी परंपरा को नजरंदाज कर ५ वी अनुसूची की बात करता है तो असली आदिवासी को धोखा दे रहा है।“
भारत के सविधान में ५वी अनुसूचि शामिल के जाने का सीधा मतलब है कि "आदिवासीयो के समग्र उत्थान के लिए उनकी मूल भाषा,धर्म,सन्सक्रति और सभ्यता को बिना हानि पहुचाये उनका उन्ही की इच्छानुसार विकास के रास्ते तैयार किये जाये ।" कारण था कि जिस नैसर्गक न्याय पद्दति ,सामाजिक सान्सक्रतिक ,धार्मिक व्यवस्था को इन्होने पुरातन काल से विकसित किया हैए सच्चे मायने में वही असली लोकतंत्र की झलक मिलती है। जिस लोकतंत्र का भविष्य मे भारत देश अनुशरण कर सकेगा । यह मार्गदर्शन हमारे सविधान निर्माताओं ने "सयुक्त राष्ट्र संघ" की आदिवासीयो के हित में दिये गये निर्देशों के अन्तर्गत लिया है । चूंकि देश में अब तक गैर आदिवासीयो के हाथ में सविधान सन्चालन की बागडोर है इसलिए अभी तक सविधान में उल्लिखित आदिवासी हित या देश में असली लोकतन्त्र स्थापित करने में असफल हुए हैं । जबकि सविधान निर्माताओं ने असली “लोकतंत्र की पाठशाला” जिसका अनुसरण किया जाना है इसलिए ऐसे विशेष क्षेत्रों को ५ वी एवं ६ ठी अनुसूची के अन्तर्गत अधिसूचित कर दिया है । अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातियो की रूढी और परम्परा जिसमें जनजातियों की मूल भाषा, धर्म,सन्सक्रति और समुदायिक व्यवस्था ही ५ वी अनुसूची की जान (life) है जिसे नजरन्दाज करके ५ वी अनुसूचि की लडाई नही लडी जा सकती । परन्तु देखने मे आ रहा है कि आदिवसी हिन्दू और आदिवासी ईसाई 5 वी अनुसूची की बात तो करते हैं पर आदिवासियों की रूढी परंपरा जो आदिवासियों की धर्म, संस्कृति के मूल आधार हैं , उसकी बात करने से कतराते हैं इसका मतलब है कि 5वीं अनुसूचि की बकालत तो कर रहें हैं लेकिन आदिवासियों की रूढी परंपरा जो कि आदिवासियों की धर्म संस्कृति संस्कार के बिना अधूरा है उस पर लोगों को उदासीन(nutral) करना कहां तक सही है । इसका सीघा अर्थ लगाया जा सकता है कि यदि आदिवासी किसी क्षेत्र में धार्मिक रूप से कमजोर होता है तो हिन्दुत्व और इसाईयत को धर्मांतरण का अवसर मिलता है । इसलिये 5वीं अनुसूचि को यदि पूर्णत सफल बनाना है तो अपनी रूढी परंपराओं मूल भाषा,धर्म,सन्सक्रति और सभ्यता को मजबूत करना होगा अन्यथा मंजिल पर पहुंचना आसान नहीं होगा । अधिकार और अस्तित्व अलग अलग मायना रखते हैं अस्तित्व है तो अधिकार हासिल हो सकते हैं !इस पर चिंतन हो ।-gsmarkam

"जरा सोचें "
मेरा प्रश्न है कि आदिवासी जब ईसाई बनकर यीसू और चर्च में प्रार्थना कर रहा है तब वह कैसे आदिवासी रह गया सब रूढी परंपरायें तो इसाईयत की हो जाती हैं । यदि वह ईसाई हो गया तो वह एक धर्म का हिस्सा हो गया । अपनी परंपरा को छोडकर केवल आरक्षण लिया जा सकता है परंपरा नहीं निभाई जा सकती । यदि आदिवासी का कोई धर्म नहीं कहा जा रहा है तब आदिवासी इसाई और हिन्दू कैसे है । आदिवासी का कोई धर्म नहीं कहना यह केवल गुमराह करने वाली बात है सरना कोया या आदि धर्म के प्रति उदासीन या न्यूट्रल करने का काम है यदि आदिवासी न्यूट्रल रहेगा तो उसे कभी भी किसी भी धर्म में धर्मांतरित किया जा सकता है अब तक यही होता आ रहा है । -gsmarkam

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