साथियों ५ वीं अनुसूचि के अंतर्गत परंपरागत रूढी व्यवस्था,आदिवासियों को अपने स्वयं के तरीके से जीने ,विचरण करने का अधिकार देती है । जिसे संविधान के दायरे में रहकर एकता बनाकर इस अधिकार को हाशिल किया जा सकता है । जो ज्यूडिशियल दायरे में रहकर नान ज्यूडिशियल बना जा सकता है , जिसे संविधान की सहमति भी है , परन्तु भारतीय संविधान से ऊपर उठकर नान ज्यूडिशियल बनना है तो आदिवासियों को पुन: स्वतंत्रता संग्राम करना होगा ! संविधान और संविधान के हर कानून का बहिस्कार करना पडेगा । ध्यान रहे आज की तारीख में संविधान से बडा कोई व्यक्ति , समुदाय या संगठन नहीं है , जो भी अधिकार हाशिल करना है संविधान के दायरे में ही रहकर करें । जनचेतना और माहौल बनाना अलग बात हो सकती है पर अधिकार पाना संविधान सम्मत ही संभव है । अन्यथा स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बजाना होगा जो सभी मूलनिवासी ,दलित पिछडे अल्पसंख्यकों को साथ लेकर ही संभव है ।-gsmarkam
0."देशज त्यौहारों की वर्तमान स्थिति" यह तो तय है कि होलिका को दुश्मनों ने चोरी से रात में मारकर जलाया होगा जिसकी यादो को ताजा बनाये रखने के लिए उन्हें किसी ना किसी देशज खुशी के त्यौहार के बीच रन्ग में भन्ग करना था। वे धीरे धीरे सफल हुए। सत्ता के हमारी मान्यताओं पर पडे प्रतिकूल प्रभाव से हम अपने त्यौहार को भूलते गये। इन्होंने हमारे हर त्यौहार के साथ अपना कोई ना कोई त्यौहार जोडकर हमारी सन्सक्रति को विस्मृत करने का प्रयास किया है, इसे समझना होगा। हमारे लोगों के द्वारा इन विषयों पर किया जा रहा शोध प्रयास सराहनीय है। हमें बहुजन आन्दोलन के अग्रणी मा० काशीराम के १५/८५ के फार्मूला से आर्य संस्कृति /अनार्य सन्सक्रति की मान्यताओं, परम्पराओं तीज त्यौहारों को छान्ट कर अलग करना होगा अन्यथा जाने अनजाने में हम अपनी खुशी के दिन को मातम के तथा अपने मातम के समय में खुशी मनाते दिखेन्गे । (गुलजार सिंह मरकाम) 1. "सान्सक्रतिक सन्घर्श में शोसल मीडिया का योगदान" बड़ी खुशी की बात है कि होली के सम्बन्ध में सोशल मीडिया में देश का पढा लिखा मूलनिवासी वर्ग देशज विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर...
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